परिणाम और दावत!
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वन बार एक दावत चल रही थी। लोग मजे कर रहे थे। पानी पूरा से लेकर, आइसक्रीम और पैन तक, काउंटर काउंटर पर भीड़ जरूरी थी। मेजबान परेशान हो गए। दावत में रिपोर्ट से ज्यादा लोग हो रहे थे। पेज फास्ट से खत्म हो रहे थे और आगे बढ़ते ही जा रही थी।
मेजबानों ने माइक उठाया। सबका ध्यान खींचा। रुकावट के लिए खेद व्यक्त किया। सारे आगंतुक कान लगाकर सुनें। होस्ट ने कहा, काठ वाले रिश्ते दाए तरफ हो जाएंगे और लड़के वाले रिश्ते बाए तरफ!
तीस-पैतीस लोग दाए साइड हो सकते हैं। तीस-पैतीस लोग साइड हो गए। तीस-चालीस लोग बिच में ही रुक रहे। आयोजकों ने जमादार को संकेत दिया। लड़कियों और लड़कियों को लेकर दोनों पर डेंडे लागाए जाने लगे...क्योंकि दावत तो "रिटायरमेंट" की थी!
तो किसान भाईयो, फसली भी एक प्रारूप की तरह होती है। फसल के आधार पर आलावा विषाणु, जीवाणु, फफूंद, कीटक, भी दावे का पहुच हो जाता है। आप फसल के लिए जो भी पोषण दो, दावत पर ये बेगाने मेहमान ही कब्जा जमाते है। फसल के संयंत्र सिर्फ भूके ही नहीं रहते, लुट भी हो जाता है।
इन बुलाए में हममानों को तत्काल धृत-दबोचा जाएगा, लाभ के लिए अच्छा होगा। घटती-बढ़ती फसलेगी और संपूर्ण उत्पादकता दें। यह काम थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन महत्व का भी है। क्योंकी अगर बेगाने शादी में, अगर ये दीवाने घुस गए... तो फिर ये एक दुसरे का साथ देते हुए "कोहराम" मचा देते हैं।
अटकल से दो-तीन उदाहरण "खिल खिलाती" है। रस वाले कीट विषाणुओं को फैलाते हैं। पत्ते काटने वाली और फल-शाखाए छेदने वाली सुंडीया, फसल को चौपट करते हुए इनसे सदने के लिए कवक को नेवता मिलती है। गर्मी थोड़ी नहीं के, कटौती के एक अंत से शिरकत करने वाली लाल-पिल्ली मकड़ी, हर पत्ते के उपर निचे जाला बुनकर, मैटरनिटी होम चलाती है। परमाणु बिचारे कुपोषण और अत्याचार से मुरझा कर मर जाता है।
हमारे परिणाम में दावा करें कि कोई नहीं आया ऐसा सोचने की गलती ना करें। डॉक्यूमेंट के चार निर्देशों को बंद करना होगा और दरवाजे पर निमंत्रण पत्र चेक करना होगा। जिसके पास निमंत्रण नहीं, उसे दावत में शिरकत नहीं! दावत में ये सब आसान है, चंदन घंटो की बात है लेकिन कटौती तो दी गई है। नतीजा जितना लंबा हुआ, खातेबंदी का काम करते ही रहेंगे।
सबसे पहले खाते की जानकारी लेनी चाहिए। सांवा, मकरा घास, खारयु, चीनयारी, जंगली चौलाई, बोखना, छोटी दूधि, कुंजरू जैसी जैसे जल्दी जल्दी बीज निकालती है। इनके बीजे एक साथ नहीं होते। आसानी से सड़ाती नहीं है। मिट्टी में बसने वाले जीव भी खत्म नहीं हो सकते। यह एक दिन मे नहीं निकलेगी। सालों से हम लोग लगे हुए हैं, खेतों में अपना जम बनाए रखा है। इन्हे निकाल कर समाप्त करना या नष्ट करना संभव नहीं है। लेकिन, यह कटौती पे हम ना हो पाए, यह देखना हमारा काम है।
बुवाई के पहले और बुवाई के तुरंत बाद, लेकिन सफलता बढ़ने के पहले, दो सक्रिय तत्वों से बने शाखनाशी का नुस्खा किया गया तो जुड़वाती 35 ते 45 दिन तक सीधे जम नहीं पाएगी। लेकिन इस दरम्यान सफलता जम जाएगी और तय ही आवंटन पर इतने हम हो जाएंगे के, जम ना पाए। दागी गई डॉट इन वेबसाइट के होम पेज पर आप अलग-अलग दागताओं का इस्तेमाल करने के लिए इस्तेमाल के लिए बनाए गए खरपत वार एवरेज निकासी के लिए चुने हुए इंसुलेटर और प्लास्टिक शीट जैसे आधुनिक पहचान की जानकारी प्राप्त करेंगे। आप इस वेबसाइट के होमपेज को बेशक भेट दे।
खरपत वारों की तरह "फफूंदे और जीवाणु" भी मिट्टी के घर बनाए रखते हैं। फसल के जो भी पदार्थ मिट्टी में दब जाते हैं, इन पर उनका बसेरा बनता-उजड़ता रहा है। यह बनने-उजडने मे नष्ट होने से बचने के लिए यह खराब, सिस्ट और रेशे बनाता है, जो द्रवित मे निद्रित होकर अपने पुश्तों को बचाए रखता है। सफलता को होते सिचाई से यह जाग्रत हो जाता है और अपना छिछोरापन दिखाने में कोई कमी नहीं रखता। कुच्छ स्लाइस के रूट्स से शिरकत करें है तो कुछ सीधे-सीधे काम पर फल, दानों पर जोर जमाते है। घास और घास में बने घावों से शिरतक कवक और जीवाणु के लिए आसान होता है। यह एक बार प्रवेश मिल गया फिर उसका कुरपाते दिखने में कोई कसर नहीं दिखा।
जिस तरह, आयरन को काटने के लिए आयरन के आरी की जरूरत होती है। उसी बीमारी का निर्माण करने वाले इन जीवाणु और फफूँदो के खिलाप भी उन्हीं भाई-बंदों को काम मानते हैं। शुडोमोनास और बेसिलस जैसे जीवाणु, त्रिकोडर्मा जैसे फफूँदे यह काम बखूबी शिकायतें हैं। जब भी मुनासिफ़ हो, मिट्टी मे और फ़र्श पर चलकर फैलाने की कोशिश करें। पूर्णत: सड़ा हुआ गोबर खाद, वर्मीकंपोष्ट मे साथ देने से भी मिट्टी में जमने का अवसर मिलता है। मिट्टी या कंपोष्ट मे मिलाने से पहले अगर एक रात तक गुड के 1 प्रतिशत का घोल आया तो उसकी अनिद्रा की स्थिति टूट जाती है। "रीसेट ग्री डॉट इन" वेबसाइट के होम पेज पर आपको और भी उपलब्ध जानकारी और प्रस्ताव दिखाई देंगे।
जब से करोना ने दुनिया को सब कुछ सिखा दिया है तो हर किसी को वायरस या विषाणु के खतरे का अनुभव हो गया है। क्रोमियम के दौरे में भी कोई कमी नहीं होती है। इनके बाहर उनका कोई अस्तित्व नहीं होता है, लेकिन एक बार संयंत्र के कप में प्रवेश हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मे परिणाम को कमजोर करने में कोई समानता नहीं कर सकता है। दुनिया मे इस दर्द की कोई दवा आजतक नहीं बनी है। शायद आगे भी नहीं बनेगी. वायरस के प्रकोप का प्रभाव पूर्ण पहेलू है, जो आप जानते हैं तो इसे अपने परिणाम के अनुपात से रोख हो सकता है। कुछ रोग विषाणु स्वयं को सीमित कर देते हैं। सर्द हवाओं की तरह फैलते है फिर रूख बन जाता है।
वायरस के फैलाव के लिए वाहक की आवश्यकता होती है। रस्ते वाले कीड़े ही अक्सर यह काम करते हैं। यदि ये प्रशासन हो गए तो सभी काम हो जाते हैं। फिर भी यह प्रश्न तो आपके मन में उठा ही होगा। ये आए कहा से है? ये मुख्य श्रोत बीजे होते हैं। जब हम संयंत्र से बीज अनुपात करते हैं तब, अन्य बीजों के साथ मिलकर यह हमारे संबंध मे हाजिरी लगता है। अगर इसे वाहक के मदत से निशान मिलने का मौका मिला तो फिर ये जमके दावत उड़ाता है। इसीलिए यदि आप फैक्ट्री से संयंत्र ला रहे हैं, तो स्पष्ट सफाई और वॉयरस मुक्त संयंत्र देने वाले नर्सरी से ही पहुंचें।
किसान भाइयों, आपको बाजार मे वायरस होने के लिए जो भी दवाए मिलती है वह जल्दी से फसल प्रतिकार क्षमता पर असर करने वाला है। इनका असर किसी पर नहीं होता है। इसीलिए, इन दवाओं के प्रयोग से बीमारी की पहेलियाँ ही सामने आ जाती हैं। "रीसेट ग्री डॉट इन" वेबसाइट के होम पेज पर आपको और भी उपलब्ध जानकारी और प्रस्ताव दिखाई देंगे।
परिणामी अनुमान पर सबसे बड़ा सिकंदर तो किट ही होता है। आज कृषि कृषक मे जो किटक दिखाई दे रहे हैं वह प्रकृति मे विशेष कृषि के होश से ही विकसित हुए है।
आप के परिणाम में जैसे ही रसीले रस टपकता है, पत्तियाओ को दबने वाले माहू (आफिड), तैला (थ्रिप), फुदके (जस्सीड), सफेद ड्रेक जैसे किटक झटके लगते हैं। ये दिन रात अंडे देते हुए आपकी संख्या को विस्फोट करते हैं। करोड़ों अंडों से निकले हुए चूजे पूरी ताकद से सफलता का रस चूसते है। फसल को होने वाला मुख्य नुकसान यह अंडों से निकले चूझे ही करते हैं। जब निर्धारण में कमी नहीं होती है तब यह कारक कारकों पर गुजर बसर करते हैं। स्पॉट पर इनकी संख्या में विस्फोट नहीं हुआ।
आपकी फसल क्षेत्र में आप उनकी संख्या और नीचे नजर रख सकते हैं। आप इन कीड़ों को गिनें निकलोगे तो यह असनीसे नजर नहीं आएगा। इनकी संख्या समझ में नहीं आएगी. लेकिन इनका अनुमान लगाने का एक आसान तरीका है। इन कीड़ों को क्रेशर का रंग आकर्षित करता है क्यों पत्ते मे ही तो ये खाना है! उनके आखों को पीला और नीला रंग ज्यादा हरा नजर आता है। इसी का फायदा हुए पीले और नीले रंग की चादर पर छायादार आस-पास के क्षेत्र में लगाए गए तो कीड़े प्रति आकर्षित हो जाते हैं, चिपक जाते हैं। नसों को अब जब मैं देख सकता हूं। इनकी संख्या और प्रकार का अनुमान लगाया जा सकता है और कुछ नियंत्रण हेतु किटनाशकों को चुना जा सकता है। जीतने पर आप जल्दी से इन पर नियंत्रण करेंगे, वृद्धि की स्थिति बनी रहेगी और किट अनुपात नहीं मिलेगा। यह क्लिक करके आप चूसक कीड़े के नियंत्रण के लिए स्टीकी ट्रैप और दो शक्ति के किट निवारकों की जानकारी बनाएंगे। कुछ चुनिंदा ऑफर्स का फायदा भी लेंगे।
झटके आने वाले दूसरे प्रकार के जबड़े होते हैं। तो यह कतरन को काटकर नुकसान है या खरोंच कर छेद बना देता है। हेलिकोंवर्पा, तमाखू इल्ली, फाल आर्मी वर्म, गुलाबी सौन्दी, लीफ माइनर, तना छेदक, मेखला भृंग जैसे बीटल का जीवन चक्र, अंडे, इल्ली, सौंडी और कोश (शंखी) इन स्टेटों से चलता है। इसमे शंखि यह कुंभकरणीय अनिद्रा की स्थिति होती है। जब निर्धारण में कमी नहीं होती तब यह अवस्था छोटी चलती है और जीवनचक्र भी धीमा हो जाता है। लेकिन जब नतीजा तैयार होने लगता है तभी, जीवनचक्र तेजी से चलता है। शंखी से निकली पौढ़ पतंगें जैसे होती हैं। यह एक क्षेत्र से उड़कर दूसरे क्षेत्र में जाता है और इस दरम्यान सेकड़ों मिल का अंतर काटा जा सकता है। पतंगों में नर और मादा होती है। मैडा द्वारा छोड़े गए गंध से ड्रू हो कर नर उसका पीछा करता है। मिलन के बाद मां देती है। अंडों से निकली इल्लीया, तेजी से क्रेज को काटती है, टहनियों को और सावन को खुरेडती है। खा खा कर मोटे होने के बाद इल्ली अपने रूप को सही कर लेती है और फिर से खाने में जुट जाती है। अंतिम अवस्था मे सौंदिया तैयार होती है। यह सौंडीया आहार पोषण के बाद मिट्टी में घुसकर शंखि या प्युपी बनाता है। अगर जल वायु अच्छी हो तो शंखि से अपरिचित है और नए क्षेत्रों की खोज मे निकल देख रहा है।
आम परिस्थति में इनकी संख्या इतनी कम होती है, चाहे आप कितना भी खोज लें, इनका कोई भी राज्य नहीं देख पाएगा। जंगल मे जिस तरह से लोग निगरानी करते हैं लेकिन शेर नजर नहीं आता, वैसे यह बात है। आपके क्षेत्र में और विशेष कर आप जिस सफलता को लग रहे हैं, उसमें आने वाले परिणाम के संख्या को पता करने की आवश्यकता है। आप उनकी जल्दी खोज लेंगे और इस पर उपाय करेंगे, आपकी परिणामी बनी रहेगी। नजर हटी, घट दुर्घटना। एक बार यह निर्णय हुआ तो लागत भी तय हुई और ये आपके परिणाम के जो दावे उड़ाएंगे, हात कुछ भी नहीं आया!
इस समस्या पर तीन तरह के अच्छे इलाज है।
इनका जीवन चक्र मे नर-मादा मिलन होना सबसे जरूरी है। यह मिलन माँ के छोड़े हुए गंध पर आकस्मिक रूप से होता है। वैज्ञानिक हर किट के गंध की पहचान करते हुए काम गंध पाश (फेरोमोन ट्रैप) बनाते हैं। फसल और किट के अनुसार यह कामगंध पाश उपबद्ध है। यह दिया गया लिंक के माध्यम से आप खरीदारी कर सकते हैं।
दूसरा तरीका जैविक किटनाशकों पर आधारित है। इन दृश्यों पर मेटारायझीअम और बवेरिया जैसे फफूँद संक्रामक रोग फैलते हैं। अगर आप इन फफूँदों को मिट्टी में मिला देंगे तो मिट्टी सीधे सीधे मेटर पर पहुंचकर यह कवक के रेशे सड़कों के शंखी को खोज लेंगे। शंखिया खत्म होने से घबराहट-मादा की संख्या कम हो जाएगी। इन बैज़ेज किट के नाशकों की जानकारी और इनके ख़रीद के प्रस्तावों को जानने के लिए क्लिक करें।
तीसरा तरीका है, दो सक्रिय तत्वों से बने औषधि का प्रयोग। आम तौर पर बाजार में 70 प्रतिशत तक पकना, दिखना और मिलावटी दवाए मिलती है। जो अच्छी तरह मिलती है वह पुरानी टाइप की दवा पर आधारित होती है, जिससे किट कंट्रोल नहीं होता है। यह क्लिक करके आप हमेशा देख सकते हैं।
तीसरे प्रकार की जो किट है वह सही मायने में किट नहीं है। मेंढक के छह पैर होते हैं लेकिन आठ होते हैं। आम भाषा में 3 कोड कहा जाता है। लाल और पीले मकड़िया पत्ते के नीचे जाल बुनकर अंडे निकलते हैं अंडों से निकलने या चूजने लगती है। पत्ते का रसचूसकर यह अर्भक या निम्फ बनता है जो आगे चलकर जाल बुनने वाले मकड़ी बनता है। मकड़ी अपने धागों से लटककर हवा के साथ फैलती है। मिलन के बाद आपस में जुड़कर जाल बुनना उन्हें अंदर देता है। चमक नहीं दिख रही है। उनमें गर्मी अधिक होती है। नतीजा मे अक्सर यह एक अंत से घुसते है और हवा के रुख नुसार एक अंत से दूसरे अंत के और फैलते है। जब इनकी संख्या कम होती है तब पानी के रहस्य से होने से भी ये अतीत हो सकते हैं। लेकिन एक बार फैल गए तो कुछ नियंत्रण केवल चुनिंदा दवाएं ही काम करती हैं। यह क्लिक कर आप इन औषधियों के बारे में जान सकते हैं।
परिणाम पर अटकलबाजी का अध्याय खत्म नहीं होने वाला है। समेकित कृषि के इस वेब साइट के माध्यम से हम कृषि संबंधी जानकारी कैसे देने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा यह प्रयास पसंद आया हो तो मे बेशक अधिकृत।




