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पोषक मिटटी का घोल और फसल की उपज

पोषक मिटटी की घूल और फसल की उत्पादकता

रीसेट कृषि किसान भाइयों का स्वागत करता है। किसान भाइयों, फसल के निर्माण के संतुलन का महत्व हम सब जानते हैं।

परिणामी के पोषण की बात करते ही हमारे दिमाग में यूरिया, डीएपी, एसएसपीआई, एनपीके, केल्शियम नायट्रेट, मैग्नेशियम बाद, सल्फर, झिंक नंबर , फेरस बाद , मेंग्निज मामले जैसे नाम घुमने लगते हैं। तो क्या चीजें हैं?

जैविक मेन्यूअर, सूक्ष्म सुधार, बेसल डोस, ड्रेंचिंग, छिडकाव के माध्यम से हमारी लागत में लागत (खर्चे) बढ़ती है। हर साल हम लोग हजारों के खाते में मिटते हैं। कपानियों के संस्कारी विद्वान हमारे जहेन में "मिट्टी में मिलाओ और सोना उगो" का संकल्प ठूस ठूस के भरते है। फिर परेशान हो जाइए कितना मिलावटी क्यों ना हो!

  • बहुत सारे खादों का क्या होता है?
  • कितने सारे खादों की आवश्यकता होती है?
  • फसल के निर्माण के आलवा इन खादों का हमारे मिटटी पर क्या प्रभाव पड़ता है?

इन सारे सवालों को समझने के लिए हमें मिट्टी का घड़ा भरना होगा।

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मिट्टी का घोल

बीजों के अनुरण के बाद, जब बीजों में सारा पोषण खत्म हो जाता है, पौध पूरी तरह सूरज और मिट्टी पर लगातार हो जाता है। ऊर्जा के अलावा, उसकी सभी जरूरतें पूरी तरह से पूरी होती हैं। जहरब है के मिटटी और मिटटी में बसे फ्लोरोसेंट तत्व एकसमान नहीं होते। परिस्थती नुरूप में परिवर्तन होता रहता है।

यह पोषक तत्व कभी पानी में घुलते हैं, तो कभी पानी से निकलकर, अन्य स्वरूप में डिटेक्शन हो जाता है। क्योंकि पौध सिर्फ अरबी (इनऑर्गेनिक) स्वरूप में ही तत्वों का सम्मिलन हो सकता है, अन्य सारे स्वरूप पौध के सीधे सीधे काम के नहीं होते।

अकार्बनिक स्वरूप में संतृप्त तत्व पानी में जो घोल उसे सोईल घोल बनाता है याने "मिटटी का घोल: कहा जाता है। यह " मिटटी का घोल" ही घटाव के निर्माण के लिए जिम्मेदार होता है। इसका प्रकाशमान तत्व अलग-अलग श्रोतों से आता है और अलग-अलग रूपों में पानी से लुप्त हो जाता है। पृष्ठभाग पर गठन-बिगड़ता रहेता है।

मिटटी जमाव से बनी होती है। इन जालका जब अपक्षय/पतन होता है, तो प्राथमिक खनिज पदार्थ मिटटी के घोल में मिल जाता है। यह एक प्रक्रिया है। बजरी जमीन में ऐसे खनिज अधिक होते हैं। हर कमी के साथ डोमेन की मिटटी में इनका अनुपात कम होता है।

नाइट्रेटा अपक्षय होने की प्रक्रिया एकतरफ़ा होती है। मिट्टी के घोल से यह खनिज जब अवक्षेपित होते हैं, इन्हें अन्य खनिज कहा जाता है। यह दुय्यम धातु दुबारा मिट्टी के घोल में घुलमिल सकती है।

आप जानते हैं कि पौध का पोषण करने की क्षमता रखने वाला मिटटी केवल अकार्बनिक आहार ही बनता है । यह एक सीधा सीधा तत्व, मिटटी के घोल से निकलकर, उठाते हुए तत्वों से बने कणों का सलग्न हो सकता है और इस सलग्नता को खत्म कर फिर से मिटटी के घोल में मिल सकता है। इसे हम धन और ऋण-भार एक्सचेंज कहते हैं। मिटटी में ह्यूमस (ह्यूमिक एसिड) जैसे पोषक तत्व होते हैं जो कार्बनिक पोषक तत्वों को मिटटी में बनाए रखते हैं।

मिटटी में ढेर के अलावा सूक्ष्म जीव और सजीव होते हैं। इनमें से सभी सूक्ष्म जीव और कुछ सजीव मिटटी से प्राथमिक तत्व सॉक्स होते हैं। इनके द्वारा प्राप्त किए गए पोषक तत्व अब सीधे तौर पर उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन जब यह हानिकारक और सजीव मरते हैं, तब इनमें से केवल पोषक तत्व खनिजीकरण से फिर से मिट्टी के घोल में समाविष्ट हो सकते हैं। सूजा आप जाडोके क्षेत्र में सूक्ष्मजोवोको बसाने हेतु स्त्राव के माध्यम से कार्बन पदार्थ छोड़ते हैं। इससे देय की संख्या बढ़ जाती है और वो मिटटी के पोषक तत्वों को पौध के लिए संजो के रखता है।

घोल से बाहर निकल पदार्थ को फिर से घोल में आते हैं वनस्पति जड़ों से ऐसे रसायन देते हैं जो इन मच्छरों को पकडकर मिटटी के घोल में घोलते हैं। इन्हें चिलेट/नखरीन या फायटोसिडेरोफोर कहा जाता है। फेरस, जिंको, मेग्निज, कॉपर तत्वों जैसे तत्वों का पोषण करने में इनका महत्व है।

मिट्टी के घोल से कुछ पोषक तत्व जैसे नायट्रेट, क्षारीय हवा में उड़ जाते हैं तो हवा से ऐसे ही कुछ पोषक तत्व मिट्टी के घोल में उरत आते हैं। पत्ते पर और स्क्रिप्ट पर बने गाठों में जीवाणु नट का स्थिरीकरण करते हैं। बिजली के कडकने से भी नट का स्थिरीकरण होता है जो बारिश के माध्यम से मिट्टी के घोल में पहुच जाता है।

नायट्रेट और पहलू जैसे तत्व पानी के बहाव में मिलकर मिटटी की अन्ध्रुनी परतों में बह जाते हैं। इसे लीचिंग भी कहा जाता है। इसके अलावा कुछ पोषक तत्व गहरा सूक्ष्म से केशकर्शन (केपिलरी एक्सन) से तथा माइक्रोरायजा के तंतुओ के माध्यम से मिटटी के घोल में वापस आते हैं।

उपयुक्त जानकारी से हमें पता चलता है के अगर अचानक हम किसी खाते को एक साथ मिटटी में मिलाए तो हो सकता है के इसका एक हिस्सा मिटटी के घोल के माध्यम से तुरंत परिणाम में उपलब्ध हो लेकिन अधिकतर हिस्सा या तो संदर्भ भिन्नता मिटटी में बना रहेगा, या तो हवा में उड़ जाएगा, या उसकी लीचिंग हो जाएगी। तो एक बात स्पष्ट है, कोई भी कितना भी जमाओं को धीरे-धीरे कहें, छोटा छोटा किस्तोमे देता है।

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पोषक एवं सम्भावित

मिटटी का अंधेरा हमेशा पोषक तत्व से भरते हैं इसलिए मिटटी में ह्यूमस या ह्यूमिक एसिड जैसे तत्व का निर्माण करना आवश्यक है। संशोधन के आधार से पता चला है के औसत आधार पर हमारे मिट्टियों में संचित तत्व 0.1 प्रतिशत के आस पास है। इसे 1 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए। किसी भी मिट्टी में जब भी जमा तत्व 12-18 प्रतिशत के बीच होता है तो उसे जैविक मिट्टी कहा जाता है। ऐसी लाभकारी मिटटी फसल बनाने के लिए उपयुक्त है।

एक एकड़ क्षेत्र के उपरी 1 फिट परत में 17,92,000 किलो मिटटी होती है। अगर यह एक फिट की परत में 1 प्रतिशत जमा होने के लिए 17920 किलो जैविक मेन्यूअर की जरूरत होगी। एक किलो मेन्युअर की कीमत सिर्फ 5 रुपये भी पकड़े तो इसकी कीमत करीबन 90 हजार रुपये होगी। यदि कोई वस्तु 10 प्रतिशत तक घटेगी तो इसकी खर्चा करीबन 9 से 10 लाख प्रति एकड़ होगी। जाहिर तौर पर, व्यवहारिक स्वरूप में, कोई इतना खर्चा नहीं कर सकता!

इसलिए किसानों को मिट्टी में कार्बनतत्व प्रयास करने का कार्य नियमित रूप से करना होगा।

पूरी तरह से सड़ा हुआ खाद (गोबर, वर्मीकम्पोस्ट, सिटी कम्पोस्ट , फार्म यार्ड मेन्युअर) मिटटी में मिला धन और कर्ज-भार एक्सचेंज करने वाले सभी तत्व मिटटी में बने रह सकते हैं।

कोयला के मीलों से मिलनेवाले पथरीले को सोडा/पोटेश लाय से गलाने पर ह्यूमिक एसिड का सोडियम या पोटेशियम संयुग प्राप्त होता है। सड़े हुए खाद के नुकसान को पूरा करने के लिए इसका उपयोग हो सकता है। मिट्टी में मिलाने के बाद जब तक वह जाडो के क्षेत्र में बना रहता है, मिट्टी के घोल को बनाए रखता है। लेकिन रात के साथ या तो यह गल जाता है या लीचिंग मिट्टी की सामान्य परतों में चला जाता है। हम सभी जानते हैं कि नरमी के कई उपयोग हैं और इससे ह्युमिक एसिड बनाने की प्रक्रिया काफी महँगी है। इसलिए, ह्यूमिक एसिड, जैविक मेन्युअर का पर्याय नहीं है, इसका फसल उत्पादन के दौरान प्रति एकड़ 2 से 5 किलो तक इस्तेमाल किया जा सकता है । अधिक उपयोग से कोई विशेष लाभ नहीं होता है। 

समुंदर में ढेर सारे खनिज होते हैं। इसी शेवल को फाड़ की कोई कमी नहीं होती। इन समुद्र किनारे को निकालकर, फैलात फैलाकर फैलाया जाता है। खनिज निकालने वाला एसिड, अल्कली हाइड्रोलिसिस, झलक जैसा प्रकियाए करना पडती है। यह पूरी प्रकिया महंगी होती है और इसके जैविक मेनू से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकती है।

कटौती निकासी के बाद मिटटी में दबी हुई कटौती की जड़े रोडर मिटटी में जमा विधियों को घटाती है। इसी तरह अगर भविष्यवाणी के अलावा घटाई गई सफलता का हवा में झटता हिस्सा अगर कंकड़ (भुसा) कर मिटटी में गया तो वह भी सदकर कार्बाइन्स मैटेरियल्स में तब्दिल हो जाता है।

मिटटी का कार्बन संवर्धन का सबसे तारिक तरीका है धैंचा और मुंग की खेती। एक एकड़ में लगी फसल को लगभग 55 दिनों के बाद खेतों में ही पलटाई व जुताई करने से औसतन 25 से 30 टन हरी खाद तैयार हो जाती है। किसीभी फसल के बाद आवर्ती रूप से, अलटपलट कर ढैंचा और मुंग की उगाई, पलटाई व जुताई बेशक करें।

उचित शुल्क के अनुसार, आप ही मिटटी में देनदारों का बसेरा हो जाएगा। यह सूक्ष्म जीव संख्या प्रकार के होंगे। जैविक खाद के कई गुण होते हैं। ज़ोस्टरब है के इसके बाबजूद आप अज़ेटोबेक्टर, रायज़ोबीअम, पीआईएसबी, केएसबी, ट्रायकोडर्मा, शूडोमोनास, बेसिलस, बवेरिया, मेटारायज़ीअम जैसे सूक्ष्म सूक्ष्म विकल्पों का उपयोग नहीं कर सकते हैं। इनका उपयोग विशिष्ट में करना ही होगा। लेकिन केवल उन्हीं भरोसे आप मिटटी का उत्पादन नहीं बना सकते।

जब मिटटी में पर्याप्त मात्रा में जीवाणु और सूक्ष्म सूक्ष्मता की संभावना होगी तब इनमे जलन के जड़ो द्वारा और गंदगी से मार्जेट वाले चिलेटर /नखरिन / फायटोसिडेरोफोर की कोई कमी नहीं होगी। तो फ़सल को झिंक, लोह, मेग्निज और कोपर जैसे सूक्ष्मघटकों की भी कोई कमी नहीं होगी। लेकिन आने वाले समय में कभी-कभी इन चार्ट के घटते लक्षणों पर परिणाम दिखाई दे सकता है, घट सकती है। इसलिए सूक्ष्मअन्न द्रव्यों के मिश्रणों का उपयोग सफलता के वृद्धि के दरम्यान तो करना ही होगा। बन्धकों के लिए उनका आवश्यक नाम मात्र ही रहता है।

तो क्या एन-पि-के और कैल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फर खाद की भी जरूरत नहीं होगी?

कपास, सोयाबीन, मका, धान, गेहू, ज्वर, बजरा, गन्ना, पपीता, आलू, बेंगन, काली मिर्च, टमाटर, खीरा, करेला, मच्छर जैसे अहंकार के अधिक अभिमान का उपयोग करते हुए, प्रस्तुति के माध्यम से नट, फोस्पेट, पोटेश, केल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फर का निकास मोटे तौर पर होता है। नट की निकासी की गति तो फिर भी बिजली के कडकने से और जीवाणु ओ के स्थिरीकरण से अंशत: होती है, लेकिन अन्य ग्राहकों के लिए हमारे रासायनिक खादों पर पूर्णत: सतत रहेंगे। यदि आप मिश्रण की कम उपज देने वाली वस्तुओं का उपयोग करते हैं तो आप रासायनिक खादों का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन ऐसी प्रजातियों की खेती को शौकिया बनाया जा सकता है। खुले उद्योग वाले आधुनिक युग में, जहां इंसानों की पैदाइश चरम पर है, शौकिया खेती सिर्फ के छत पर ही हो सकती है।

किसान भाइयों, आशा करता हु के यह लेख आपको पसंद आएगा। कोई टिप्पणी या शंका हो तो प्रश्न में प्रश्न।

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धन्यवाद!

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