क्या सरकार अर्बन फार्मर्स के लिए कानून बनाएगी?

क्या सरकार अर्बन फार्मर्स के लिए कानून बनाएगी?

कृषि के विशेष लेख में आपका स्वागत है। भारतीय किसानों के लिए बेहतर, असहाय जीवन, यह हमारा नारा है। इसलिए इस लेख की रचना, कृषि की लागत को कम करके देखने की उम्मीद में है। हमारा यह प्रयास पसंद आएगा ऐसी आशा करता है। इस वेबसाइट के अवरोधक में जाकर आप हमारे अन्य ब्लॉग पढ़ सकते हैं!

दिल्ली शहर के 60 प्रतिशत मास की जरूरत, 25 प्रतिशत दूध और 11 साल की उम्र की जरूरत, अर्बन फार्मर्स ही पूरी तरह से करते हैं । हाइड्रोपोनिक्स, वर्टिकल फ़ार्मिंग, छायानेट, मज़ फ़ार्मिंग, पॉल्ट्री फ़ार्मिंग, एक्वा पोनिक्स के माध्यम से कई युवा, रोज़गार के साथ शहरी शहरों को सेहतमंदर सलाद, सब्ज़िया, फूल, फल, दूध, दायरे उत्पाद, अंडे और मास करा रहे हैं।

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लेकिन करोड़ों ने आजतक, इन शहरी किसानों को कोई तबज नहीं दिया है। नींद आ गई है, इस पर ध्यान देना और ठीक है। इनके लिए नियम, कानून जारी करें और सुविधा प्राप्त करें । घर के पीछे, खुली जगहों, इमारतों की छत और छज्जों में काम करने वाले इन घरेलू किसानों को, सूचनाओं के आधार पर उपलब्ध खाली जगह और खुले प्लॉट का ब्योरा लें।

तेजी से फैलते शहर, जनसंख्या विस्फोट, वृक्षारोपण परिवर्तन से लोगों को पोषक तत्वों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्र में 50 प्रतिशत और बच्चे खून की कमी से बीमार होते हैं। मोटापा बढ़ रहा है। ग्लोबल कृषि संस्थान, शहर और शहर होने के नाते कृषि को महत्व देते हैं और विशद करते हैं। वे मानते हैं कि इससे लोगों की पूरी तरह से खाद्यान्न की जरूरत होगी, रोजगार बढ़ेगा और गरीबी हटेगी!

महाराष्ट्र के पांचों शहर में, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से, लोगों की शहरी कृषि में ब्याज आवर्धन है। इसके स्थान पर सबसे पहले इन्होंने एक आदर्श का निर्माण किया। स्कूल, सरकारी और निजी संस्थानों में भी इन प्रकल्पों को बढ़ावा देना होगा। इन प्रकल्पों के लिए पर्यावरण पूरक खाद, दवाए, सिचाई, कंपोष्ट और बायोगेस प्लांट पर उपलब्ध सब्सिडी को बढ़ावा दिया जाएगा। तमिलनाडु और क्षेत्रों में भी इस तरह की कार्रवाई को चेतनया दिया जा रहा है।

कई जगह, इस विषय ने काम किया हो सकता है लेकिन प्रभावित करने वाली धारणा और अमल के अभाव में, ऐसे प्रयास अपना महत्व खो देते हैं। लोग भूल जाते हैं, या अधूरा छोड़ देते हैं।

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आने वाले दशकों में भारत भर से जुड़े स्मार्ट सिटी बनाने का सपना सरकार देख रही है। नदियों की सफाई पर हजारों करोड़ बहाए जा रहे हैं। इन प्रकल्पों को प्रतिबंधित करते समय "शहरी कृषि कानून" तैयार करने से एक अनुमान का निर्माण होगा । शहर में बदलाव तेजी से होते हैं। यह प्रदूषण, पानी की समस्या भी उग्र होती है। यह एक बड़ा व्यवधान हो सकता है। ऐसा ना हो इसलिए, विशेष सुविधाओ के साथ, मिट्टी रहित कृषि जैसे तंत्रों को बढ़ावा देना होगा।

शहरों की कृषि, पारंपरिक कृषि का कोई विकल्प नहीं है इसकी पारंपरिक कृषि का कोई मुकाबला नहीं हो सकता है। लेकिन सुरक्षा अन्न में यह आघात अवशोषक (शॉक एबसॉर्बर) का काम बेशक कर सकता है!

संदर्भ: डाउन टू अर्थ


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