स्वतंत्रता के बाद भारत में प्रमुख सूखे
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भारत में सूखे का इतिहास बहुत पुराना है और 1947 में आज़ादी के बाद भी देश को कई बड़े सूखे का सामना करना पड़ा है, जिसका असर खास क्षेत्रों और पूरे देश पर पड़ा है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सूखे का ब्यौरा दिया गया है:
क्षेत्रीय सूखा:
- 1965: इस गंभीर सूखे ने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।
- 1987: इस सूखे ने मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात को प्रभावित किया, जिससे कृषि क्षेत्र में भारी संकट उत्पन्न हो गया।
- 2009: इस सूखे ने महाराष्ट्र और कर्नाटक को विशेष रूप से प्रभावित किया।
अखिल भारतीय सूखा:
- 1972, 1979, 1982, 2002: इन वर्षों में व्यापक रूप से कमजोर या असफल मानसून देखा गया, जिसके परिणामस्वरूप देश के बड़े हिस्से में सूखा पड़ा।
- 2011-2015: इस अवधि में भारत के कई क्षेत्रों में बहुवर्षीय सूखा पड़ा।
स्वतंत्रता के बाद बेहतर निगरानी:
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये कुछ प्रमुख सूखे हैं, जबकि भारत ने कई अन्य का सामना किया है। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, भारत ने अपने सूखा निगरानी और प्रभाव आकलन प्रणालियों को मजबूत किया। इससे सूखे और उनके प्रभावों की अधिक व्यापक समझ विकसित हुई है।
सूखा-प्रवण क्षेत्र:
भारत में कुछ क्षेत्र सूखे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इनमें शामिल हैं:
- महाराष्ट्र (मराठवाड़ा और विदर्भ)
- कर्नाटक (उत्तर कर्नाटक)
- आंध्र प्रदेश (रायलसीमा)
- गुजरात (सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात)
- मध्य प्रदेश (बुंदेलखंड)
- ओडिशा (पश्चिमी क्षेत्र)
सूखे का प्रभाव:
सूखे का भारत पर विनाशकारी प्रभाव हो सकता है, जिससे कृषि, जल उपलब्धता और आजीविका प्रभावित हो सकती है। इससे सामाजिक अशांति और पलायन भी हो सकता है।
आगे देख रहा:
भारत के लिए सूखा एक आवर्ती चुनौती है। जलवायु परिवर्तन से भविष्य में सूखे की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि होने की उम्मीद है। जल प्रबंधन प्रथाओं में सुधार और सूखा प्रतिरोधी फसलों के विकास पर भारत का ध्यान इन घटनाओं के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण होगा।




