सोयाबीन की खेती
सोयाबीन की खेती युवा भारतीय किसानों के लिए एक बेहतरीन अवसर है। वनस्पति प्रोटीन का समृद्ध स्रोत होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोयाबीन की मांग बहुत अधिक है। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए, किसानों को मानक डेटा और सूचना तक पहुंच की आवश्यकता है। यह ब्लॉग उसी की पेशकश करने का इरादा रखता है। सोयाबीन की उन्नत खेती कैसे करें? इस सवाल का जबाब देता है। प्रारंभ में, हमें उच्च उपज के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता है। सोयाबीन की फसल में प्रति किलो बीज से एक क्विंटल उपज प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित करें। सोयाबीन को कुल क्षेत्रफल के केवल 40% पर ही रोपें, उर्वरित क्षेत्र मे आप बहुवार्षिक, वार्षिक या आवर्ती फसलों का संयोग चुने। अगर सोयाबीन मे नुकसान हो तो अन्य फसले आपको घाटेसे बचाएंगी।
सोयाबीन की खेती के लिए जलवायु
इस फसल के लिए कम नमी जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके बीजों का अंकुरण 25 सेल्सियस तापमानपर 4 दिनों में हो जाता है, ठंडे मॉसम मे अंकुरण मे 8-10 दिन लगते हैं। इस फसल के लिए 60-65 सें.मी. वर्षा वाले स्थान उपयुक्त माने गए हैं।
सोयाबीन के उन्नत बिज और बीज परीक्षण:
- मध्यप्रदेश के लिए एनआरसी 2 (अहिल्या 1), एनआरसी -12 (अहिल्या 2), एनआरसी -7 (अहिल्या 3) और एनआरसी -37 (अहिल्या 4) यह उन्नत बिज है।
- महाराष्ट्र में फुले संगम, फुले किमया, 753 केडीएस, एमएयूएस 612 जैसी नई किस्में तथा जेएस 335, जे एस 9305, फुले संगम केडीएस 726 यह उन्नत बिज है।
- असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर राज्यों में एमएसीएस 1407, जेएस 93-05, जेएस 95-60, जेएस 80-21, एनआरसी 2, एनआरसी 37, पंजाब 1, कलितुर आदि उन्नत बिज है।
पूरे क्षेत्र में एक ही किस्म के बीज न लगाएं। 4-5 अलग-अलग किस्में लगाएं जिससे जलवायु-किट प्रकोप आदि घटकोंमें होने वाले बदलाव का औसत उत्पादकतापर कम असर होगा. जैवविविधता के लिए भी यह आवश्यक होता है।
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बिजोंका अंकुरण परिक्षण अवश्य करना चाहिए। 3 सेट में 100 प्रतिनिधि बीजों का अंकुरण परीक्षण करें। जूट के बोरों की सहायता से आप इस प्रयोग को लॉन्ग फोल्ड विधि से कर सकते हैं. इस फसल पर आधारित विशेष लेख में इसकी जानकारी दियी गयी है.
औसत अंकुरण क्षमता कम से कम 80 प्रतिशत होनी चाहिए। इससे कम होने पर नुकसान हो सकता है।
क्योंकि सोयाबीन के बीज मे अंकुर के पोषण हेतु पोषक तत्वोंका संचय बहोत जादा होता है, मिट्टी मे स्थित कीड़े, फफूंद तथा जीवाणु अंकुरित होने वाले बीज पर हमला कर सकते है। इसीलिए बीज को उपचारित करना अनिवार्य है। पहले कवकनाशी, फिर कीटनाशक और अंत में जैविक उपचार करें।
जब तक मिट्टीमें पर्याप्त नमी न हो तब तक बोने में जल्दबाजी न करें। बुवाई का सर्वोत्तम समय जून के तीसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के मध्य तक होता है। बुवाई परम्परागत तरीके से नहीं करनी चाहिए। जुलाई, अगस्ट में अगर बारिश नहीं होती तो फसल को जलसिचाई करनी होगी. किसान इसकी तैयारी करके रखे.
सोयबीन की बुवाई कैसे करे?
15 से 20 किलो बीज प्रति एकड़ के औसत से बीजों का इस्तेमाल करे। संशोधित विधि से बोना चाहिए।
बुवाई पंक्तियों में करनी चाहिए जिससे फसलों का निराई करने में आसानी हो। सीड ड्रिल का इस्तेमाल कर सकते है। फरो इरिगेटेड रेज्ड बैड पद्धति या ब्राड बैड पद्धति (बी.बी.एफ) का प्रयोजन कर सकते है। प्रति एकड़ पौधोकी संख्या डेढ़ से दो लाख होनी चाहिए। बेड के मध्य से बगल के बेड के मध्य की दूरी 3.5 फीट से अधिक या 2.75 फीट से कम नहीं होनी चाहिए। बेड का पृष्ठभाग लगभग 3 फीट का रखे। प्रत्येक बेड पर दो पंक्तियों में 1.5 फिट का अंतर रखे। एक ही पंक्ति में दो टोकन के बीच 6 इंच की दूरी रखें। दो से तीन बीज एक साथ बोयें।
सोयबीन के फसल को खरपतवार से बचाए
शुरुवाती 30-35 दिनोंमे फसल को खरपतवार से बचाना चाहिए। एक बार फसल ने बढ़त बना लियी तो बादमे खरपतवार फसल को नुकसान नहीं कर सकती।
बुवाई के 24 घंटे के भीतर प्री इमरजंस खरपतवारनाशी का छिडकाव करे.
- Katyayani Penza 5 ml/lit (Pendimethalin 30%+ Imazethapyr 2% EC )
- FMC Authority NXT 2.5 ml/lit (Sulfentrazone 28% + Clomazone 30% WP)
बुवाई के 20-25 दिन बाद पोस्ट इमरजंस खरपतवारनाशी का छिडकाव करे
- UPL Iris 2 ml/lit (Sodium Aceflourofen 16.5% + Clodinafop Propargyl 8% EC)
- Adama Shaked 4 ml/lit (Propaquizafop 2.5% + Imazethapyr 3.75% ww)
- BASF Odysee 1 gm/lit (Imazethapyr 35% + Imazamox 35% WG)
- Crystal AMORA 3 ml/lit (Fomesafen 12 % + Quizalofop ethyl 3% w/w SC)
- Parijat PARIFLEX 2ml/lit (Fluazifop-p-butyl 11.1% w/w + Fomesafen 11.1% w/w SL)
पुराने दौर के सिंगल कंटेट खरपतवार नाशी के इस्तेमाल से परहेज करे। अधिकतर खरपतवार उनके प्रति प्रतिकार क्षम होते है। एमेझोन पर खरपतवार उपलब्ध है, देखने के लिए यहाँ क्लिक करे
सोयबीन के फसल का पोषण कैसे करे?
किसीभी फसल का संतुलित पोषण करने के लिए उचित उर्वरकोंका उपयोग उचित वक्त पर करना चाहिए. आधुनिक किसान बेसल डोस छिडकाव से उर्वरक प्रबंधन करता है. यह एक एकड़ के डोसेस दे रहे है. आपके मिटटी के उर्वरक क्षमता नुसार इनमे छोटे मोटे बदलाव किये जा सकते है.
प्रति एकड़ बेसल डोस निम्न खादों का समावेश करे।
- 10:26: 26 100 किलो
- सूक्ष्मअन्नद्रव्य मिश्रण 5 किलो
- सल्फर डब्ल्यु.डी. जी. 3 किलो
प्रति एकड़ निम्न खाद छिड़काव या ड्रेंचिग के माध्यमसे दे, २०० लिटर पानी में मिलाकर दे.
- फसल उग आने के तुरंत बाद 19-19-19 5 किलो ड्रेंचींग से दे.
- फूल आनेसे पहले 12-61-00 3 किलो, केल्शियम नायट्रेट २ किलो, झिंक डाय ऑक्साइड १०० ग्राम
- फल्लिया लगनेसे पहले 00-52-34 5 किलो, डाय सोडियम बोरेट (बोरान २०%) ५०० ग्राम
- फल्लियोमे दाने भरते हुए 13-00-45 5 किलो
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सोयाबीन का स्वास्थ्य प्रबंधन:
सोयाबीन मे फफूंद, व्हायरस, चूसक किट तथा इलियोंका प्रादुर्भाव होता है। इनका मेनेजमेंट प्रादुर्भाव होने से पहले करने पर लागत मे बचत हो सकती है।
फफूंद प्रबंधन
फफूंद मेनेजमेंट का सबसे पहला नियम है के मिट्टी मे पानी जमा ना हो। पौधों का रूट झोन बेड मे होता है। अगर बेडसे सलग्न नाली जलभराव से मुक्त रही तो जड़े फफूंद से मुक्त रहेगी। लेकिन हवा के नमी से फसल को बचाने की संभावना कम होती है, एसेमे पत्तों पर फफूंद का असर दिखाई देता है। सोयाबीन मे निम्न फफूंद नाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
लीफ स्पॉट तथा फल्ली का मुरझाना
टेब्यूकोनाझोल 10% + सल्फर 65 डब्ल्यू जी 2.5 मिली प्रति लीटर (ऑनलाइन खरीदे)
सरकोस्पोरा लीफ स्पॉट
पायराक्लोस्ट्रोबिन 13.3% + इपॉक्सीकोनेझोल 0.5% एसई 1 मिली प्रति लीटर (ऑनलाइन खरीदे)
फ्लुक्झापायरोक्झाड 16.7% +पायरॅक्लोस्ट्रोबिन 33.3 % एस सी 0.6 मिली प्रति लीटर
व्हायरस प्रबंधन
पीला मोज़ेक वायरस फैलने के लिए वाहक पर अवलंबून हो है। अक्सर यह वाहक का काम रसचूसने वाली किट होती है। अगर इस किट का नियंत्रण कर लिया गया तो वायरस फैल नहीं सकता। एस बार वायरस का प्रकोप हो गया तो इससे फसल मे किसी छिड़काव का उपयोग नहीं होता। अक्सर वायरस सेल्फ लिमिटिंग होते है। वो एक हद से ज्यादा नहीं फैल पाते।
किट प्रबंधन
चूसक कीटों के नियंत्रण हेतु मैनेजमेंट का एक महत्वपूर्ण नियम है के “नत्र” विभाजित करे। चिपचिपे पीले और नीले पैड पर कीटों को ट्रैप करना भी मदत करता है। शुरुवातसे अगर प्रति एकर 80 पीले और 20 नीले ट्रैप बिछाए गए तो चूसक कीटों की पैदावार नियंत्रित हो सकती है।
चुसक कीटों के अलावा सोयाबीन में इल्लियोंका प्रभाव अधिक होता है. इनमे निम्न इल्लियोंका प्रभाव होता है.
- तंमाखु इल्ली (स्पोडोप्टेरा)
- अर्ध कुंडलक इल्ली (सेमी लुपर)
- छल्ला/मेखला भृंग (गर्ड्ल बीटल)
- तना छेदक मक्खी (स्टेम फ्लाय)
- फल्ली छेदक (मरुका विटारा)
- चन्ने की इल्ली (हेलिकोव्हर्पा)
इन कीटोंके प्रबंधन हेतु निम्न छिडकाव किए जा सकते है.
अर्ध कुंडलक इल्ली (सेमी लुपर), छल्ला/मेखला भृंग (गर्ड्ल बीटल), तना छेदक मक्खी (स्टेम फ्लाय)
- सिंजेंटा - एम्प्लिगो ०.४ मिली प्रति लिटर (क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 09.30 % + लैम्ब्डा-सायहलोथ्रिन 04.60 % झेड सी.)
- सिंजेंटा - अलीका ०.२५ मिली प्रति लिटर (थियामेथोक्सम 12.60 % + लैम्ब्डा-सायहलोथ्रिन 09.50 % झेड सी. )
- बायर-सोलोमोंन ०.८ मिली प्रति लिटर (बीटा-साइफ्लुथ्रिन 08.49 % + इमिडाक्लोप्रीड 19.81 % w/w ओडी)
तंमाखु इल्ली (स्पोडोप्टेरा), अर्ध कुंडलक इल्ली (सेमी लुपर), चन्ने की इल्ली (हेलिकोव्हर्पा)
- अदामा-प्लिथोरा २ मिली प्रति लिटर (नोवालुरोन 05.25 % + इंडोक्साकार्ब 04.50 % SC)
छिडकाव कम करने हेतु कुच्छ इल्लियों के लिए आप सेक्स फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल कर सकते है. सेक्स फेरोमोंन ट्रैप से इल्लियोंका जीवनचक्र खंडित होने से संख्या बढ़ नही पाती, एसेमे महंगे किटनाशकोंके खर्चे से बचा जा सकता है. निम्न इल्लियोंके ट्रैप आप ऑनलाइन खरीद सकते है. प्रति एकड़ पाच ट्रैप लगाने पर अगर जरुरुत हो तो ट्रैप की संख्या प्रति एकड़ १५ तक बढ़ादे.
मानसून के दौरान रुक-रुक कर होने वाले सूखे से कैसे निपटें?
जब हम सोयाबीन जैसी व्यावसायिक फसलों के साथ काम कर रहे हों तो जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बेड और फ़रो की व्यवस्था मानसून के कमजोर होने पर खेतों को अधिकतम पानी सोखने की क्षमता प्रदान करती है। यही व्यवस्था मानसून के भारी होने पर खेत से अतिरिक्त पानी निकालने में मदद करती है।
जुलाई-अगस्त के दौरान शुष्क मौसम की स्थिति में सोयाबीन की फसल को नुकसान होगा। ऐसे में किसानों को कुओं या तालाबों से सिंचाई की व्यवस्था के लिए तैयार रहना चाहिए।
इसके अतिरिक्त किसानों को वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से पानी की कमी को कम करने के लिए केओलिन का प्रयोग करना चाहिए। पोटैशियम नाइट्रेट की खुराक के प्रयोग से फसलों को सूखा और शुष्क मौसम बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
कटाई तथा उपज
सोयबीन की कटनी १४५ दिनोंमे हो जाती है जब पत्तिया और फल्लिया सुख जाती है. इस वक्त दाने में १५ प्रतिशत नमी होती है.
इस फसल में मुनाफा पाने के लिए किसान को सजग और हिसाब से काम करना है. जल-वायु परिवर्तन के दौरमें उपज में अंतर आने की सम्भावना होती है. भारत में आजतक सोयाबीन की अधिकतम उपज प्रति एकड़ २२-२३ क्विंटल तक पाई गयी है जो विश्व के औसत उपज से करीबन आधी है! भारतीयों के थाली में सोयाबीनसे बने व्यंजन कम ही होते है तथा सोयाबीन तेल के इस्तेमाल से भी परहेज किया जाता है. एसेमे घरेलू इस्तेमाल कम है. सोयबीन एक औद्योगिक उपज होनेसे इसका समर्थन मूल्य आंतरराष्ट्रिय दरोंपर आधारित होता है जिसमे भारी उतार-चढ़ाव हो सकता है. बुआई के वक्त बढ़े हुए दरोंके मोह में अपना पूरा क्षेत्र इस फसल को देने से बचिए.
बिज, खाद एव दवाइया गुणवत्ता पूर्ण और प्रमाणित होने की पुष्टि करे. भारत में नकली का बाजार ६० प्रतिशत से अधिक होने से, इस विषय मे, कृषक का सजग होना आवश्यक है. एडव्हांस पेमेंट कर पक्की रसीद प्राप्त करे, जिसपे तारीख, बिल नंबर, कृषीविपणन लायसेन्स नंबर तथा जीएसटी नंबर स्पष्ट रूप से छपा हो.


