इल्लिया और सुंडिया
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फसलों पर आने वाले दूसरे प्रकार के कीटों को जबड़े होते है. तो यह फसल को काटकर, खुरेदकर, छेद बनाकर नुकसान करते है. वक्त मिल जाए तो पत्तिया खानेवाली सुंडीया फसल पर एक पत्ती नही रहने देगी. खुरेद ने वाली सुंडी पौधे के डंठल, शाखाओ और फलो में छेद बनाती है.
एक दिन निम्बू के बगीचे में पहुचा तो वहा बड़ी तेज आवाज हो रही थी. ध्यानपूर्वक देखने पर पता चला के निम्बू के पुरे खेत में एक सुंडी ने मोर्चा बना लिया था और वह तेजी से निम्बू के पौधे खा रही थी. मेरे पास क्रिस्टल का मिसाइल था. तुरंत इसका छिड़काव किया. दुसरे दिन गया तो सारी सुंडिया मरकर लटक रही थी!
कपास, चना, अरहर में आनेवाली हेलिकोंवर्पा ने अन्य ढेर सारे फसलों में दावत उडाना सिख लिया है. तमाखू इल्ली भी करीबन हर फसल में पत्तिया काट काट कर फसल को नंगा करती है. पिछले दशक में दुसरे देशो से घुस आई आर्मीवर्म ने पहले मक्के के फसल में भौकाल फैला दिया था. अब यह भारत के हर कोने में मिलती है और अन्य फसलों में गुजर बसर करना शुरू कर चुकी है. कपास की गुलाबी सूँडी ने किसानों के नाक में दम करके रखा है. उपर से साफ़ और भर पुर रुई से भरे दिखाई देने वाले बॉल के अंदर छुपी हुई गुलाबी सुंडी किसानों के अरमान खा जाती है. इसी तरह टमाटर में आने वाला लीफ मायनर, बेंगन को तबाह करता तना और फल छेदक, जड़े खाने वाली सफेद लट, सोयाबीन के शाखाओं को चक्राकार काटने वाला मेखला भृंग, और गन्ने में अलग अलग वक्त में छेड़ करने वाले छेदक उपज पर जमकर दावत उड़ाते है.
इन सारे कीटो का जीवन चक्र प्रौढ़, अंडे, इल्ली/सूँडी और कोश (शंखि) इन अवस्थाओं से चलता है.

जब खेतों मे फसले नहीं होती तब, यह सारी अवस्थाए लंबे अन्तराल तक चलती है और जीवनचक्र भी धीमा होता है. लेकिन जब फसले लहलहाने लगती है, इन किटोंको प्रचुर मात्रा में भोजन उपलब्ध होता है और इनका जीवनचक्र तेजी से चलता है. हर जीवन चक्र में जब अंडे दिए जाते है तो संख्या विस्पोट होता है. मिलन के बाद हर मादा ५० से २०० अंडे देती है और बीस से ४५ दिनों में इनसे निकले इल्लिया, मादा बनके फिरसे इतने ही अंडे देने के लिए तैयार हो जाती है. संख्या वृद्धि का गणित सामान्य गणित से अलग होता है जिसमे संख्याए गुणाकार से बढती है. इस गणित को समझना थोडा कठिन है लेकिन "जादुई गणित" इस लेख में इसे समझाया गया है. पढ़ेने हेतु यहा क्लिक करे. इस चक्रीय गणित के नियमा (कम्पाउंड इफेक्ट) नुसार कीटों की संख्या कम वक्त में अरबों खरबों में चली जाती है, जो फसल के लिए बेहद घातक साबित होता है. क्या होगा अगर हम यह "कम्पाउंड इफेक्ट" हम अपने जीवन में लगाए? यहाँ एक किताब का विज्ञापन दे रहा हु. क्लिक करके आप इस किताब को पढ़ सकते है और अपना जीवन अधिक सफल बना सकते है!
कीटों के चार अवस्थाओं में से शंखि अवस्यथा, एक कुम्भकर्णीय अवस्था होती है. इसमें इल्लिया सोती है और नींद मेंही खुदको बदल कर प्रौढ़ बन जाती है. शंखि को खोल कर पौढ़ बाहर निकलते है.
कुछ प्रजातियों में प्रौढ़ पतंगे होते है तो अन्य प्रजातियों में ये मक्खी और भुंगे होते है. यह एक क्षेत्र से उड़कर दूसरे क्षेत्र मे जाते है और इस दरम्यान यह सेकड़ों मिल का अंतर काट सकते है. प्रौढ़ावस्था मे नर और मादा अलग अलगत होते है. फसलों पर ये कुछ ख़ास असर नही करते. अंडे देने के लिए अच्छा इलाका ढूंढने के बाद, मादा, उड़ते और बैठते, अपने शारीर से एक गंध छोडती है. यह गंध ५ से ६ हजार स्क्वेअर फिट इलाके में फैलते रहती है. यह एक कामगंध होता है. इससे आकर्षित हो कर नर, मादा का पता लगते है और मिलन करते है. मिलन के बाद मादा, ढेर सारे अंडे देती है.
सोचिए अगर आपके फसल में हेलीकोव्हर्पा की १० मादाए बाहर से उडकर आती है. हर मादा २०० अंडे देगी. इन २०० अंडो से निकली हुए २०० इल्लिया अगले ३५ दिनों में १०० नर और १०० मदाए बनेगी जो (१०० x २००) २०,००० अंडे देगी. इसके अगले ३५-४० दिनों में आपके फसल पर करीबन २,००,००,००० (दो करोड़) अंडे होंगे!
अंडों से निकली इल्लीया, तेजी से पत्तियों को काटती है, टहनियों को और फलों को खुरेदती है. खा खा कर मोटी होने के बाद इल्लीया अपने रूप को बदलती है और फिरसे खाने मे जुट जाती है. इल्ली से सुंडी बनने के दौरान यह चार से पाच बार अपना रूप बदलती है. आखरी अवस्था मे सूँडीया तैयार होती है. यह सूँडीया प्रचुर भोजन पोषण के बाद मिट्टी मे घुसकर शंखि या प्युपी बनाती है. अगर जल वायु अच्छी हो तो जल्द ही शंखि से प्रौढ़ निकलते है और कामगंध के माध्यम से मिलन के लिए साथी की खोज में जुट जाते है.
आम परिस्थतिमे इनकी संख्या इतनी कम होती है, के आप चाहे जितना खोजे, इनकी किसी भी अवस्था को देख नहीं पाएंगे. जंगल मे जिस तरह लोग घूमते है लेकिन शेर नजर नहीं आता, वैसेही यह बात है. आपके क्षेत्र मे और खास कर आप जिस फसल को लगा रहे है, उसमे आने वाले कीटों के संख्या को पता करने की आवश्यकता है. आप जीतने जल्दी इनकी खोज करेंगे और इस पर उपाय करेंगे, आपकी फसल बनी रहेगी. नजर हटी, दुर्घटना घटी. एक बार अगर इनका जीवन चक्र आपके खेतों में तेजी से चलने लगा तो फिर आप इन्हें नियंत्रित नही कर पाओगे. ये आपके फसल की जो दावत उड़ाएंगे, हात कुछ भी नहीं आएगा!
इस समस्या पर तीन तरह के अच्छे इलाज है.
इनके जीवन चक्र मे नर-मादा मिलन होना सबसे जरूरी होता है. यह मिलन मादा के छोड़े हुए कामगंध पर निर्भर होता है. वैज्ञानिकों ने हर किट के गंध की पहचान करते हुए, किटनिहाय कामगंध पाश (PHEROMONE TRAP) बनाए है. फसल और किट अनुसार यह कामगंध पाश उपबद्ध है. यहा क्लिक कर आप इन्हे खरीद सकते है.
दूसरा तरीका जैविक किटनाशकों पर आधारीत है. इन कीटों पर मेटारायझीअम और बवेरिआ जैसे फफूँद संक्रामक रोग फैलाते है. अगर आप इन फफूँदो को मिट्टी मे मिलाएंगे तो मिट्टी मे पड़े ऑर्गेनिक मेटर पर बढ़ते हुए यह फफूंद के रेशे कीटों के शंखि को खोजकर संक्रमित करेंगे. शंखिया खत्म होने से प्रौढ़ नर-मादा की संख्या कम हो जाएगी.
अनेक वैज्ञानिक और किसान मेटारायझीअम और बवेरिआ के छिडकाव का प्रयोग करने की सलाह देते है. लेकिन फसल के पत्तियों पर इन फफुन्दो को जीविन व्यापन करने का मौका बेहद कम होता है. इसलिए परिणाम इतने अच्छे नही मिलते.
अच्छे परिणाम हेतु हर फसल की तैयारी के पूर्व जब आप मिटटी तैयार करते हो, कम्पोस्ट में मिलाकर इनका प्रयोग करे. इन जैविक किट नाशकों के जानकारी और इनके खरीद पर ऑफर्स को जानने हेतु यहा क्लिक करे.
तीसरा तरीका है, रासायनिक दवा का इस्तेमाल. इन कीटों की शंखी और प्रौढ़ अवस्थाओं पर रासायनिक दवाओं का असर कम ही होता है. लेकिन अंडे और इल्ली अवस्था को दवाओं के माध्यम से मार सकते है. दवा चुनते समय ऐसी दवा चुननी होगी जो दोनों अवस्थाओं पर असर करे. क्योकि अगर सिर्फ सुंडीया मरती है तो कुछ दिनों में अंडो से निकली सुंडीयो को मारने के लिए फिरसे छिडकाव करना पड़ेगा. अगर अंडे और सुंडीया दोनों मारी जाती है तो फिर इनका जीवनचक्र धीमा हो जाएगा और फसल बच पाएगी. यहा क्लिक करके आप उमदा पर्याय देख सकते हो.
आम किसान या तो कीटों के बारे में जानकारी नही रखता या इसको मुसीबत समझकर पहेले तो इसका इन्तेजार करता है और किट आगयी तो उसको नियंत्रित करने हेतु ढेर सारा खर्चा करता है. एक समझदार किसान कीटो के व्यवस्थापन और निरिक्षण हेतु क्रमश: जैविक किट नाशक और फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करता है. इस कारण कीटो का संख्या विस्पोट होने से पहले ही जागरूकता से चुनिन्दा रसायन इस्तेमाल करके सस्ते में किट व्यवस्थापन कर लेता है.
यह लेख "रिसेट एग्री" इस वेबसाइटपर लिखे जा रहे "दावत ए फसल" इस विशेष ब्लॉग का हिस्सा है. इस ब्लॉग के अन्य लेख पढने हेतु यहा क्लिक करे.
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