फफूँदे और जीवाणु
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खरपतवार, चुसक किट और सुंडीयों के तरह "फफूँदे और जीवाणु" भी फसल घरोंदा बनाए बैठे होते है. मिट्टी में जो भी जीव अवशेष मिट्टी मे दबने लगते है, उन पर इन सूक्ष्म जीवों का बसेरा बनता-उजड़ता रहेता है. इस बनने-उजडने मे नष्ट होनेसे बचने के लिए यह स्पोअर, सिस्ट और रेशे बनाते है, जो सूखे मे निद्रित होकर अपने पुश्तों को बचाए रखते है. फसल को होते सिचाई से यह जागृत हो जाते है और जिव अवशेषों को सडाने का अपना काम शुरू करते है. कुछ सूक्ष्मजिव पौधे के जड़ों से शिरकत करे है, तो कुछ सीधे पत्तियों पर फल, दानों पर जोर जमाते है. पत्तों और फलों मे कीटों द्वारा बने घावों से शिरतक करना फफूंद और जीवाणुओ के लिए आसान होता है. पौधे में एकबार प्रवेश मिल गया तो फिर इनमे से कुच्छ पौधे की जान लिए बिना नही रुकते. कुछ जान तो नही लेते लेकिन पौधे को अलग अलग तरीके से बीमार रखते हुए, उपज का नुकसान करते है.
उदाहारणवश यहा भूरी रोग पर चर्चा करेंगे. करीबन हर फफूंद जनित बिमारी के लिए एक जैसिही व्यवस्थापन प्रणाली का अविष्कार करना होगा.
पत्तीयों पर भूरे रंग की परत बनाने वाले पावडरी मिल्ड्यू फफूंद को कोन नही जानता. पहले इसके सफेद छीटे दिखाई देते है जो फैलकर एक दुसरे में मिल जाते है. इस बिमारी के कारण पौधे के बढवार कम होती है, फुल और फल कम लगते है और अच्छे से बन भी नही पाते. बिमारी आगे बढ़कर पौधे को खत्म कर सकती है. यह रोग हवा से फैलता है. ठंडे और सूखे जलवायु में इसे फैलने में मदत करता है. यह किसी एक अकेले फफूंद से होने वाला रोग नही है. इसकी ८०० से अधिक प्रजातीया है जो १०,००० से अधिक पौध प्रजातियों में बिमारी फैलाती है. यह फफूंद पौधों पर बीते लाखो वर्षो से असर कर रही है, इसीलिए हम इसे किसी एक अकेली दवा से नियंत्रित नही कर सकते. हमे एक साथ अनेक सावधानिया रखनी होगी तभी उपज बच पाएगी.
अनेक किसान देखभाल में कमी रखते हुए सिर्फ महंगे दवाओंपर निर्भर रहेने की सोचते है. फिर या तो फसल हात से जाती है या तो दवाई पर खर्चा होता है. परिणाम स्वरूप मुनाफा होने के बजाय नुकसान ही नुकसान होता है.
अंगूर, मिर्च, बेंगन, टमाटर, भिन्डी, तरबूज, खरबूज, करेला, तुरई जैसे फसलों में यह फफूंद असर करती है. इन फसलों में फुल और फल आने तक बेशुरमार खर्चे होते है और अगर भूरी फैली तो बेहद नुकसान होता है.
बचने के लिए एक से अधिक प्रजातियों के बिज इस्तेमाल करे. मिट्टी में पुराने फसलों के अवशेष ना रहने दे. साफ़ सफाई करे. जो भी कम्पोस्ट इस्तेमाल करे, इसमें ट्रायकोडर्मा अवश्य मिलाए. बेसल डोस में पोटाश, केल्शियम, बोरेक्स और सिलिकेट युक्त उर्वरक अवश्य मिलाए. अगर जलवायु सुखी है तो नमी बनाने के लिए पानी की बौछार करे.
पौधों के सेहत पर नजर बनाए रखे. भूरी के धब्बे नजर आते ही, अँपेलोमायसेस क्विस्क्वालिस इस जैविक दवा का ५ मिली प्रति लिटर के औसत से छिडकाव करे.
अगर फिरभी भूरी के फैलाव में कमी ना हो तो आपको दो सक्रिय तत्वों वाले फफूंदनाशियों का इस्तेमाल करना होगा. इसके लिए आप रिसेट एग्री के वेबसाइट के सर्च इंजिन में powdery mildew comobifungicide इन शब्दों के साथ सर्च करेंगे तो आपको उपयुक्त दवाए दिखाई देगी. इसमें कस्टोडिया, कल्च, केब्रियोटॉप, इम्पेक्ट एक्ट्रा, शमीर, विश्मा जैसी दवाओं का समावेश है. आम हो चुके दवाओं का इस्तेमाल ना करे.
अब यहा फसलों में फैलनेवाले प्रतिनिधिक जीवाणु जनित रोग का अभ्यास करते है. बीते दो तिन दशकों में अनार की एक लहर सी आयी थी लेकिन झंथोमोनास नामक जीवाणु से होने वाले झुलसा रोग ने इस लहर को रोख दिया. किसानों ने हजारों हेक्टेयर में फैले अनार के बगान निकाल के फेक दीए. इस रोग में पत्तियों और फलों पर गिले धब्बे पड़ते है. पत्तिया गिरती है. फलो पर घाव बनते है. शुरूआती लक्षण उभरने के एक-दो सप्ताह में साफ़ सुधरे अनार खराब हो जाते है.
अब यहा फसलों में फैलनेवाले प्रतिनिधिक जीवाणु जनित रोग का अभ्यास करते है. बीते दो तिन दशकों में अनार की एक लहर सी आयी थी लेकिन झंथोमोनास नामक जीवाणु से होने वाले झुलसा रोग ने इस लहर को रोख दिया. किसानों ने हजारों हेक्टेयर में फैले अनार के बगान निकाल के फेक दीए. इस रोग में पत्तियों और फलों पर गिले धब्बे पड़ते है. पत्तिया गिरती है. फुल और फलो पर घाव बनते है. शुरूआती लक्षण उभरने के एक-दो सप्ताह में साफ़ सुधरे अनार खराब हो जाते है. ढंग से व्यवस्थापन ना करने पर रोग डंठल और शाखाओ पर भी फैलता है. पूरा पेड़ सुख सकता है.
इस रोग का कोई पुक्था इलाज नही है. लेकिन इसका व्यवस्थापन, रसायन और जैविक पद्धतीसे इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है. रोगमुक्त पौधों का चुनाव करना, बरसात में फुल और फल ना लगेने देना, उपज निकालने के बाद सारे पत्ते झडाकर पेड़ो को चार महीने का पूर्ण विश्राम देना. इस दौरान साफ़ सफाई रखना. 0.05 % स्ट्रेप्टोसायक्लीन+ 0.2% कॉपर ओक्सी क्लोराइड का छिडकाव असरदार होता है. पौधों और मिटटी पर सूडोमोनास, बेसिलस, स्ट्रेप्टोमायसेस इन जीवाणुओ का छिडकाव करने से रोग जीवाणु झंथोमोनास का प्रभाव कम होता है. बगीचे के पृष्ठभागों से झंथोमोनास के सफाई के लिए नेनो सिल्व्हर, हायड्रोजन पेरोक्साइड का इस्तेमाल किया जा सकता है.
जिस तरह, लोहे को काटने के लिए लोहे के आरी इस्तेमाल होती है. उसी तरह रोग निर्माण करने वाले इन जीवाणु और फफूँदो के खिलाप भी इनके ही भाई-बंदों को काम मे लगाया जा सकता है. शुडोमोनास और बेसिलस जैसे जीवाणु, ट्रायकोडर्मा जैसी फफूँदे यह काम बखूबी निभाती है. जब भी मुनासिफ़ हो, मिट्टी मे और पत्तियों पर इनको फैलाने की कोशिश करे. पूर्णत: सड़ी हुई गोबर खाद, वर्मीकंपोष्ट मे मिलाकर देने से इनको मिट्टी मे जमने का अवसर मिलता है. मिट्टी या कंपोष्ट मे मिलाने से पहले अगर इन्हे एक रात तक गुड के १ प्रतिशत के घोल मे मिलाया गया तो इनकी निद्रा अवस्था टूटकर यह पूर्तिले हो जाते है. "रीसेटएग्री डॉट इन" वेबसाइट के होम पेज पर आपको और भी उपयुक्त जानकारी और ऑफर्स का पता चलेगा.
यह लेख "रिसेट एग्री" इस वेबसाइटपर लिखे जा रहे "दावत ए फसल" इस विशेष ब्लॉग का हिस्सा है. इस ब्लॉग के अन्य लेख पढने हेतु यहा क्लिक करे.
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