मकड़िया
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तीसरे प्रकार के जो किट है वह सही मायने मे किट नहीं है. कीटों को छह पैर होते है लेकिन इन्हे आठ होते है. आम भाषा मे इनको मकड़ी कहा जाता है. लाल और पीली मकड़िया पत्तों के नीचे जाल बुनकर अंडे देती है अंडों से निकले लार्वा या चूझे निकलते है. पत्तों का रस चूसकर यह अर्भक या निम्फ़ बनते है जो आगे चलकर जाल बुनने वाले मकड़ी बनते है. मकड़ीया अपने धागों से लटककर हवा के साथ फैलती है. मिलन के बाद घूमते फिरते जाल बुनकर उनके अंदर अंडे देती है. नमी मे यह फैल नहीं पाते. इनका प्रजनन गर्मी मे अधिक होता है. फसल मे अक्सर यह एक छोर से घुसते है और हवा के रुख नुसार एक छोर से दूसरे छोर के और फैलते जाते है. जब इनकी संख्या कम होती है तब सादे पानी के छिड़काव से बनने वाली नमी भी इनको पस्त कर सकती है. लेकिन एक बार फैल गए तो इनके नियंत्रण हेतु सिर्फ चुनिंदा दवाए ही काम करती है. यहा क्लिक कर आप इन दवाओ के बारे मे जान सकते है.
फसल पर दावत उड़ाने वाले कीटों का अध्याय खत्म ना होने वाला है. रीसेट एग्री के इस वेब साइट के माध्यम से हम कृषि संबंधित जानकारी रोचट तरीके से देने की कोशिश कर रहे है. आपको हमारा यह प्रयास पसंद आया हो तो कमेंट मे अवश्य लिखे.
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