प्याज में मुनाफा क्यों नही होता?
Share
रिसेट एग्री के इस ब्लॉग पर किसान भाइयों का स्वागत है. प्याज की खेती करीबन पुरे भारत में होती है लकिन सबसे अधिक उत्पादन महाराष्ट्र के लासलगाव में होता है. यहा के किसानों ने प्याज की खेती में मुनाफा कमाना सिख लिया है. तो अगर आपको प्याज से मुनाफा कमाना हो तो लासलगाव के किसानोंसे सिखना चाहिए.
यहा के किसान साल भर में प्याज की तिन फसले लेते है: यहा के किसान साल में प्याज की तिन फसल लेते है. खरीप, रबी और जायद. ऐसा करने से उन्हें, प्याज के कीमत में सालभर होने वाले उताच-चढ़ाव का फायदा मिलता है. अगर खरीप में नुकसान हुआ तो रबी और जायद में मुनाफा बन जात है.
यहा के किसान सिर्फ प्याज नही उगाते: प्याज की कीमते जितनी कम ज्यादा होती है उतना असर प्याज के बिज, पौधे, बल्ब (बेना), प्याज के हरे पत्तों की कीमतों में नही होता. लासलगाव के किसान प्याज के साथ साथ बिज, पौधे, बल्ब और हरे पत्ते भी बेचते है. इससे इनकी लागत कम होती है और वक्त वक्त पर मुनाफा बनते रहेता है.
प्याज सीधा मंडी में नही बेचते: महाराष्ट्र की सरकार किसानों को प्याज का गोदाम (चाल) बनाने हेतु सबसिडी देती है. लासलगाव के किसानों के पास पक्के गोदाम बने हुए है. इसमें उपजे हुए प्याज का ग्रेडिंग कर हवादार तरीके से जमा किया जाता है. आजकल इनमे सेंसर लगे होते है जो प्याज सड़ने पर सिग्नल देते है. सड़े हुए प्याज को निकालकर साफ़ किया जा सकता है. छह महीनोंतक प्याज बचाके रखा जा सकता है.
घनी रोपाई: यहा पौधे रोपते हुए एक एकड़ में करीबन तिन लाख पौधे रोपे जाते है. अगर हर पौधे से ८० से १०० ग्राम का एक प्याज बना तो तिन लाख पौधों से ३० टन प्याज की उपज होगी. इसमें १० प्रतिशत का लोस भी हुआ तो भी प्रति एकड़ २७ टन प्याज हात में आता है, जिसका मूल्य कमसे कम १,३५,००० होता है .
प्रयोगशीलता: लासलगाव के किसान बेहद प्रयोगशील है. आजकल अनेक किसान, प्याज के लिए खास तौर पर बनाए जाने वाले प्लास्टिक शिट मल्चिंग का उपयोग करते है. इससे खरपतवार नियंत्रण होता है, बारिश के पानी की निकासी जल्दी होती है, पानी की जरूरत कम होती है. शिट के अंदर लगे टपक सिचाई से उर्वरक देना आसान होता है.
उर्वरकों की खुराक: लासलगाव के किसान रासायनिक उर्वरकोंका इस्तेमाल अवश्य करते है. उन्हें ओर्गेनिक फार्मिंग से कोई लेना-देना नही है. बेड बनाते हुए डी. ए. पि. एम्ओपी, २४-२४-०, १०-२६-२६, एस एस पि, सल्फर, मैग्नेशियम सल्फेट, फेरस सल्फेट, झिंक सल्फेट, मेंग्निज सल्फेट, बोरेक्स आदि खादों का खुराक दिया जाता है. रोपाई के तुरंत बाद केल्शियम नायट्रेट, १९-१९-१९ की खुराक दियी जाती है. फसल ४० दिन की होने पर फिरसे डीएपी, एम्ओपि, १२-६१-००, ००-५२-३४, १३-००-४५, ००-००-५० जैसे उर्वरकोंकी मत्राए जोड़ी जाती है.
दवाओंका उपयोग: यहा के किसान फसल में बिमारी फैलने का इन्तेजार नही करते. अनुभव अनुसार वो वक्त वक्त पर फफूंदनाशी, किटनाशी एव पिजीआर का इस्तेमाल अवश्य करते है. प्याज में इस्तेमाल होने वाले फफूंदनाशीयों में स्कोअर, एमीस्टार, कस्तोडीआ, विस्मा, क्लच, केब्रीटॉप का समावेश होता है. किटनाशकों में रिगोरिन, रोगोंहिट, जम्प, अगाड़ी सुपर, रीवा, ब्रावो ५०००, नायक, मेटासीटोक्स इस्तेमाल होते है. खरपतवार नियंत्रण के लिए एजिल, टर्गा सुपर, अटलांटिस, गोल, इम्पूल, हकामा, व्हिप सुपर इन शाखनाशीयोंका उपयोग होता है. पौधे तयार करते वक्त बीजोंपर साफ़ जैसे फफूंदनाशी का संस्कार किया जाता है. प्याज में ओरगेनिक दवाए इस्तेमाल नही कियी जाती. सही वक्त पर दवाओं का इस्तेमाल करने से खर्चा तो बचता ही है, फसल को विपरीत परिस्थिति का सामना ना करना पड़ने से, उपज बढती है.
आर्थिक प्रबंधन: लासलगाव के किसान खर्चे में बचत करते है लेकिन खर्चे से बचते नही है. जहा जरूरत हो, दवाओं, उर्वरकों, गोदामो पर खर्चा जरुर करते है. कम वक्त, कम क्षेत्र में अधिक से अधिक प्रकार की तथा रेकोर्ड उपज लेने के लिए तथा इस उपज को मुनाफे में बेचने के लिए वो प्रतिबद्ध है. प्याज के बिज और रोप तो अन्य किसानों को ही बेचे जाते है. ऐसा करने से उनकी लागत तो कम होती है, उलटा मुनाफा ही हो जाता है. तरकारी मार्किट में हरा पत्ता बेचने से उनके मजदूरी, उर्वरक और दवाओ के खर्चे वक्त से पहले निकल आते है. जब प्याज निकल आता है तब रेट ना मिले तो सारा प्याज वो गोदामों में भर देते है और चढ़े रेट में धीरे धीरे बेचते है. लासलगाव के किसान खुदको नुकसान उठाने से बचाते है.
एक छोटा लेकिन दुसरे क्षेत्र का उदाहरण ले तो बात जल्दी समझ सकेंगे. समझिए आपने आम की दूकान लगाई है. आम की खरीद, दूकान के खर्चे और आपकी मेहनत सब लगाकर आपकी लागत प्रति किलो १०० रु है और आपको १०० किलो आम बेचने है (कुल लागत १०,०००). अगर आप पहले ग्राहक को ९० रु प्रति किलों से ५ किलो आम बेचते है तो आपको इस सौदे में ५० रूपये घाटा हुआ है. अगले ग्राहक के आने तक आपकी कुल लागत बढकर १००५० रूपये हो चुकी है. तो जितने बार आप घाटा उठाएंगे आपकी कुल लागत हर बार बढती ही जाएगी.
लासलगाव के किसान उनकी कुल लागत तो बढने नही देते उसे घटाने के लिए जुटे हुए होते है.
आशा करते है के इस लेख से आपको जानकारी और प्रेरणा अवश्य मिली होगी.
लेख पसंद आया हो तो अवश्य शेअर करे. कोई शिकायत हो तो कमेन्ट अवश्य करे.




